खैर मित्र संजीव रंजन ने अपनी कविता से इस ब्लॉग की अच्छी शुरुआत की। अपने व्यस्त जीवन और इसके जंजाल में फँसे और बौखलाए मन और धुंधली दृष्टि को कहाँ समय मिलता है एक नन्हे से पौध के पनपते, उगते, प्रस्फुटित होते जीवन को देखने और उससे संवेदित होने की ?
मौका मिला है तो मैं भी एक पुरानी कविता पेश कर देता हूँ:
" कहानी है यह एक छोटे बच्चे की,
जो एक रात, नानी की गोद मैं बैठा,
लोरी में बेसुध,
ढूध-भात खाते,
कटोरी में देख चाँद की परछाई,
चाँद को लेने की जिद कर बैठा,
सारे मनौव्वल , मनुहार नानी के हार गए,
वह न माना !
अपनी जिद में , रोते रहा ...रोते रहा
और , रोते-रोते सो गया।
.......आज भी,
अपने हांथों में लिए,
गुच्छे गुलमुहर के,
पंखुरियां पलाश की ,
दौड़ता फिरता है
अमलतास के फूलों से ढकी सड़कों पर,
...रोज़ रात देर तलक, पीछा किया करता है चाँद का वह,
सफर चाँद का ख़त्म हो जाता है,
जुस्तजू चाँद की ख़त्म नहीं होती उसकी ! "
(यह कविता तकरीबन बीस साल पुरानी है , यह लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी , मसूरी के इन-हाउस पत्रिका ' स्मृति' में १९९१ में छापी थी। मैंने अपनी धुंदली स्मृति से इसे बाहर निकाल , कहीं कहीं कुछ परिवर्तन कर इसे फिर से पेश किया है।)
Monday, March 16, 2009
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कविता की यह जूगलबंदी तो ,मित्र हमें निः शब्द ( शब्द के लिए माफ़ करेंगें ) कर दिया है.
ReplyDeleteकल्पना और कोमल भावों की इस उडान के क्या कहने .
इसी तरह लिखते रहें .
और सुजीत जी patnagandhi मैदान पर भी अपनी टिपण्णी पोस्ट करें.
Bhavpurn kavita, Swagat.
ReplyDeletevery good blog
ReplyDeletemy blog
hindi me www.sharegenius.blogspot.com
in english
www.popati.blogspot.com
स्वागत है............
ReplyDeletehello sir ji welcome blog flied
ReplyDeletebahut achchi rachna. aapka blog jagat men swagathai.
ReplyDeletegood, narayan narayan
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