Sunday, March 22, 2009

माँ का घर और माँ की स्मृति


माँ का घर और माँ की स्मृति




(मित्र कौशल किशोर ने अपने ब्लॉग 'पटना गाँधी मैदान ' http://www.patnagandhimaidan.blogspot.com/पर अत्यन्त मार्मिक संस्मरण लिखा है कौशल अपनी बातों में माँ का जिक्र अक्सर किया करते हैं। उनकाविश्वास है की उनका जीवन और उनके परिवार की उन्नति उनकी माँ के परिश्रम और बड़े सपनों के दखने के साहस का प्रतिफल हैवह एक कर्मठ और प्रगतिशील महिला थीं - अपनी पीढी और सामाजिक परिप्रेक्ष्य से काफी आगे। उनकी असमय मृत्यु हो गयी और उनके जीवन का एक लंबा सक्रिय दौर अधूरा रह गया। यह संस्मरण कौशल का व्यक्तिगत है मगर जो मुद्दे उन्होंने उठाये हैं, वे सामाजिक, जागतिक महत्व के हैं। पुराने संभ्रांत परिवार, पीढी दर पीढी का बदलाव, शहरीकरण, आधुनिक शिक्षा का प्रभाव, गाँव से सामाजिक-आर्थिक रिश्तों का टूटना या उनके टूटने कि चरमराहट आदि आदि. मित्र संजीव रंजन ने उनसे अनुमति लेकर मुझे उनका ब्लॉग 'गाताजाएबंजारा ' पर पोस्ट करने को कहा है। )

माँ को गुजरे हुए डेढ़ दशक हो गयाएक दुर्घटना में माँ अचानक चल बसीमार्च के महीने में माँ हर रोज़ याद आती हैं पिछले जून में घर से लौटते समय रास्ते में माँ के घर पर नजर पड़ी. घर की वर्तमान दशा मन में यादों की बारात ले आया. साथ में कैमरा था. सोचा दूर से ही सही इसकी एक तस्वीर उतार लूं
घर १९३४ में मेरे नाना ने बनबाया था. उस दौर में इलाके भर में इकलौता भव्य मकान. बैठक खाने की फर्श में संगमरमर का काम. उसके एक साल बाद माँ का जन्म हुआ. संयुक्त परिवार - दो भाईयों के बीच में नौ संताने, माँआठवें नंबर पर. कुल चार भाई और पांच बहनें. कहते हैं की माँ के जन्म के बाद मेरे ननिहाल में धन और यश दोनोंकी भारी वृद्धि हुई. फतुहा, कलकत्ता से लेकर ढाका तक से व्यापार हुआ. ग्रामीण और कस्बाई समाज में शानो-शौकत के सारे संसाधन जुटाए गए१९४२ तक शहर में ठौर ठिकाना, घोडा, बन्दूक, जमींदारी, बड़े संतान की BHU से वकालत की पढ़ाई. चार भाईयों में, वकील, किसान, प्रोफ़ेसर और डॉक्टर बने. माँ से बड़ी तीन बहनों की शिक्षा पांचवी तक पाठशाले पर और १९३८ तक उन सब की शादी. दो बहनों की खगडिया के एक प्रगतिशील समृद्ध परिवार मेंशादी. परिवार स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी शरीक रहा. यह परिवार राजनीति में बारास्ता विधायक ( पांच बार ) मंत्री पद तक पंहुचा . माँ से ठीक बड़ी बहन की शिक्षा सन चालीस से चौआलिस तक पटना के एकमात्र बालिकाआवासीय विद्यालय में हुई.
सन पचास के बाद भी माँ के घर के वारिशों का रसूख बढ़ता रहा. दूसरी पीढी ने भी तरक्की की - डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, व्यापार, बहुराष्ट्रीय कम्पनी, सब ओर. माँ इसी घर में पली और बढ़ी. लेकिन आज माँ के घर की हालत देखिये. ऐसा नहीं है की इस घर को वारिसों ने बेंच दिया है. मालिकान हक़ बरकरार है. आज भी धन-धान्य से परिपूर्ण. अर्थ, शिक्षा, राजनीति और सामजिक हैसियत. पर यह पारिवारिक विरासत बदहाल क्यों? क्यों इसकी तस्वीर धुन्धली लगती है? क्या समय के साथ माँ की पुण्य स्मृति भी उसके घर की तरह धुंधली पड़ जायगी ? सोच कर ख़ुद को बड़ा असहाय पाता हूँ

सिसीफस जिन्दा है !

यह कविता मैंने १९९१ में मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान लिखी थी । मेरे अवचेतन में मुक्तिबोध की लम्बी कविता "अंधेरे में' थी जिससे मैं काफी प्रभावित था। यह कविता को मैंने एक बड़े पोस्टर पर लिखकर और इसके साथ अपनी एक कलाकृति जो अभी मिल नहीं पा रही, 'प्रतिबिम्ब' नामक ' wall journal' पर प्रर्दशित किया था। कई हिन्दी-दां मित्र ( जिन्होंने हिन्दी साहित्य का वैकल्पिक विषय लिया था और मुक्तिबोध की कविता पढ़ी थी ( मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में थी), मुझपर यह आरोप लगाया की मैंने इसे अंधेरे में से 'चुराई ' है या उसका एक तरह से कॉपी किया है। सच्चाई यह है कि मसूरी के ठण्ड से जूझते हुए शराब के शुरूर में मैंने इसे एक लम्बी बैठक में लिखा और इसका एकमात्र गवाह मेरे मित्र श्री अमित यादव (भारतीय प्रसाशनिक सेवा) हैं जो अभी दिल्ली में वाणिज्य मंत्रालय में निदेशक हैं। उन्होंने मुक्तिबोध की 'अंधेरे में ' नहीं पढ़ी थी , लेकिन मेरी कविता सुनकर प्रभावित जरूर हुए थे। मैं स्वीकार करता हूँ कि शैली और शिल्प में मेरी कविता मुक्तिबोध से जरूर प्रभावित है लेकिन इसकी प्रेरणा और मनः स्थिति बिल्कुल अलग है। मैं अपने आप को मुक्तिबोध जैसे कवि, साहित्यकार और चिन्तक के समक्ष तुच्छ मानता हूँ। तुलना करना निरा पागलपन होगा! खैर , इस आरोप और एक ग्लानि-बोध से मैं अभी तक मुक्त नहीं हो पाया . कहीं यह कविता दूसरी अनेक कविताओं की तरह खो न जाए इसीलिये इसे पोस्ट कर रहा हूँ। सिसीफस एक यूनानी मिथकीय पात्र है । अलबर्ट कामू ने इसपर एक किताब भी लिखी है. वे पाठक जिन्होंने 'अंधेरे में ' पढ़ी है, वे स्वतंत्र रूप से मुझे पुनः आरोपित कर सकते हैं । सबसे बड़ी बात , यह कविता मुक्तिबोध को समर्पित है और 'मुक्तिबोध से क्षमा याचना' के साथ प्रस्तुत है।
सिसीफस जिन्दा है
" रोज रात
अपने थके-हारे दिलो-दिमाग को
थपकियाँ देकर जब मैं
सुलाने की कोशिश करता हूँ
तब
वह अचानक न जाने कहाँ से
आ जाता है मेरे अंधेरे कमरे में
खड़ा हो जाता है मेरे सिरहाने
और
झिंझोड़कर, तोड़ डालता है मेरी तंद्रा
मैं नहीं चाहता कि जाग जाऊं
इतनी थकान-परेशानी के बाद
मैं नहीं चाहता उससे बातें करना
फिर भी
वह जगा ही डालता है मुझे
उँगलियाँ पकड़कर मेरी
ले जाता मुझे न जाने कहाँ ...
और मैं
जैसे किसी मंत्र से सम्मोहित
किसी सुगंध पर मुग्ध
आत्मविस्मृत सा ...
खिंचता चलता जाता हूँ उसके पीछे-पीछे
शहर से दूर ...जंगलों के पार
घाटियों के पास कहीं
जहाँ मुर्दे दफ़न होते हैं
चिल्लाते हैं भेड़िये , सियार और उल्लू जहाँ
बिच्छु और विषधर विचरते हैं ।
उस अंधियारे में वैसे नारकीय दृश्य को
नहीं सहन कर पता मैं
चिल्लाता हूँ, भागना चाहता हूँ वहां से
लेकिन वह रोक लेता है मुझे
कहता है , यह तुम्हारी ही दुनिया है
तेरे ही स्वप्न और आकांक्षाएं दफ़न हैं यहाँ
जमींदोज हैं तेरे पूर्वज , रिश्ते-नाते और दोस्त-मुहिम
तेरी ही आत्मा की कब्रगाह है यह !
मैं नहीं मानता
नहीं-नहीं , मेरी दुनिया नहीं है यह
वह तो है, जहाँ हैं -
ऊंची इमारतें , गाडियाँ , चक्करदार सीढीयाँ
गलीचे, गुलदस्ते और रंग-बिरंगी तितलियाँ
भीड़-भाड़, नियम-कानून , आदेश-प्रावधान
अफसरान-लीडरान और वे ढेर सारी चीज़ें
नहीं-नहीं , मेरी दुनिया कहीं और है !
उस सर्द रात में जड़ देता है वह
मेरे गालों पर एक ज़ोरदार तमाचा
और कहता है...
तुम खो गए हो कहीं एक भूलभूलैए में
गुम हो गए हो किन्हीं पुरपेंच गलियों में
जहाँ आदमी नहीं प्रेत डोलते हैं
मन नहीं मशीन बोलते हैं !
उसकी आवाज़ में गाम्भीर्य है
बातों में सच्चाई है
मैं कोई तर्क नहीं देता
सर झुककर स्वीकार करता हूँ उसकी बातें !
वह कहता है...
देख
रोज़ तू हत्या करता है अपने सपनों की
गला घोंटता है अपनी आकाँक्षाओं का
धोखा देता है स्वयं को
क्या नहीं है यह आत्म-प्रवंचना ?
तेरे कर्मों का फल भुगत रहा हूँ मैं ,
इन घाटियों में मारा-फिर रहा हूँ अकेला
तेरे मृत स्वप्नों का बोझ ढोता हूँ अपने सर पर
ले जाता हूँ उन्हें , घाटियों के पार , उस चोटी पर
ताकि वे जीवित हो उठें
फलित हों , पूर्ण हों सपने तेरे
मगर मैं असफल हूँ भाई मेरे
तेरे सपनों के चट्टान बहुत भारी हैं
कोशिश करता हूँ ...
पर लड़खड़ा जाता हूँ
वे गिरकर लुढ़क जाते हैं नीचे
फिर , उठाकर मैं कोशिश करता हूँ
ऊपर , चोटी पर ले जाने की उन्हें
यह क्रम चल ही रहा है...
अनवरत...अंतहीन!
और मैं असफल !
मैं कुछ नहीं कहता ....
मुझे तरस आता है उसपर
आँखें नम हो जाती हैं
पर कुछ नहीं करता मैं !
कुछ नहीं कह पता मैं !
भय सा लगता है उससे मुझे
क्योंकि , उसके सवालों के जवाब
नहीं हैं मेरे पास
मैं लौट जाना चाहता हूँ
अपने आरामदायी बिस्तर पर
भूल जाना चाहता हूँ उसे
लेकिन
रोज रात
जब मैं थपकियाँ देकर
सुलाने की कोशिश किया करता हूँ--
अपने स्वप्नों - आकाँक्षाओं को
वह खड़ा हो जाता है मेरे सिरहाने
जगा डालता है मुझे वह
मेरे ही भीतर , पला-बढ़ा आदमी
मेरे ही स्वप्नों का मूर्त-रूप वह
आत्मचेतना का पुंज
मेरी ही छाया, मेरा प्रतिरूप
मेरा मन- मनु वह
शापग्रस्त सिसीफस
जो रोज रात
शहर से दूर
घाटियों के पार कहीं
चट्टानें ढोता है ! "

Monday, March 16, 2009

एक कविता

खैर मित्र संजीव रंजन ने अपनी कविता से इस ब्लॉग की अच्छी शुरुआत की। अपने व्यस्त जीवन और इसके जंजाल में फँसे और बौखलाए मन और धुंधली दृष्टि को कहाँ समय मिलता है एक नन्हे से पौध के पनपते, उगते, प्रस्फुटित होते जीवन को देखने और उससे संवेदित होने की ?
मौका मिला है तो मैं भी एक पुरानी कविता पेश कर देता हूँ:


" कहानी है यह एक छोटे बच्चे की,
जो एक रात, नानी की गोद मैं बैठा,
लोरी में बेसुध,
ढूध-भात खाते,
कटोरी में देख चाँद की परछाई,
चाँद को लेने की जिद कर बैठा,
सारे मनौव्वल , मनुहार नानी के हार गए,
वह न माना !
अपनी जिद में , रोते रहा ...रोते रहा
और , रोते-रोते सो गया।
.......आज भी,
अपने हांथों में लिए,
गुच्छे गुलमुहर के,

पंखुरियां पलाश की ,
दौड़ता फिरता है
अमलतास के फूलों से ढकी सड़कों पर,
...रोज़ रात देर तलक, पीछा किया करता है चाँद का वह,
सफर चाँद का ख़त्म हो जाता है,
जुस्तजू चाँद की ख़त्म नहीं होती उसकी ! "


(यह कविता तकरीबन बीस साल पुरानी है , यह लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी , मसूरी के इन-हाउस पत्रिका ' स्मृति' में १९९१ में छापी थी। मैंने अपनी धुंदली स्मृति से इसे बाहर निकाल , कहीं कहीं कुछ परिवर्तन कर इसे फिर से पेश किया है।)

जीना हुआ दुश्वार ...

यह कविता मेरे एक मित्र के हौसले का प्रतिफल है. मैंने टेलीफून पर कभी बात-चीत के दौरान उनसे अपने बालकनी के नीचे-के पार्किंग स्पेस में जड़ पकड़ रहे एक नन्हे वट वृक्ष के ताजा स्थिति का ज़िक्र किया था. उन्होंने कहा था कि यह कविता-सी प्रतीत हो रही है - अतः इसे पोस्ट कर रहा हूँ :


मेरी बालकनी के नीचे-के
पार्किंग स्पेस में
एक बे-आबरू कुआँ और एक नन्हा वट-वृक्ष है
ऊपर-वाले तले का किरायदार
उस पर
सुबह और शाम को
पाइप से पतले-धार की
बारिश करता है
जिससे
उसके अक्सर पत्ते
और उसका आधा से ज्यादा
किशोर धड
सतह पर भींग जाता है
नीचे की ज़मीन भींग जाती है,
पर पानी-पानी नहीं होता है
(बदहाल ज़मीन क्षण-भर में
पी जाती है)
उसका बाक़ी-का मुख्य आहार
फिनाइल आदि के मसाले-वाला
कचडे का शोरबा है
अल्ल-सुबह से देर दोपहर तक
सफाई-वाले और वालियां
ताबड़तोड़
वह शोरबा
गुटखे की पीक के साथ
उस नौनिहाल की जड़ में
पटाये जाते हैं
........
दोपहर में
कभी कुछ देर तक
उस बेजुबान को
जब देखने का अवसर होता है
तब लगता है
कि फुन्गिओं पर की
उसकी नवजात हरी पत्तियां
सिहर रहीं हैं

... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

Monday, March 9, 2009

है ख़बर गर्म मेरे आने की ...

तुमने तो कमबख्त दुन्दुभी बजा दी. और यहाँ आलम है कि कथा को मैं जितना खोद रहा हूँ नामुराद उतनी हीं धंसती जा रही है. तुमको याद हो कि न हो, जेएनयू दिनों कि एक बहकी शाम को मैंने फैज़ साहब का एक शेर बड़े विकल मन से तुमको सुनाया था - एक कड़ा दर्द जो गीत बनता हीं नहीं, दिल के तारीक़ शिगाफों से निकलता हीं नहीं. उस पर तुमने उनकी दूसरी ग़ज़ल को गा-के सुनाया था. याद है न वो ग़ज़ल - 'और कुछ देर में आकर मेरे तन्हा दिल को, फिक्र आ लेगा कि तन्हाई का क्या चारा करें, दर्द आएगा दबे पाँव लिए सुर्ख चिराग, वो जो इक दर्द धड़कता है मेरे दिल से परे'. तुम्हारे मुनीर नियाजी हमारी कैफियत पर कहते - लाई है अब उडा के गए मौसमों की बास'. बहरहाल, मैं संकट में तो था हीं, तुम्हारे ऐलान के बाद से बेल्लाग खतरे में आ गया हूँ. आगे अल्लाह मालिक है ... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

इस ब्लॉग की शुरुआत

मित्र संजीव रंजन 'गाता जाए बंजारा ' की शरुआत करना चाहते थे और मैं भी इसकी तकनीकी प्रक्रिया में शामिल हो गया। ईमानदारी से कहूँ तो हम दोनों blogging के तक्नीकी जटिलताओ से वाकिफ नहीं है । हम दोनों को नौशिखिया ही समझा जाए। इसी चक्कर में हम ब्लॉग की जटिलताओं में फँस गए मगर blogging का भूत हम दोनों के सर पर इस कदर सवार है कि हमने सोचा 'गाता जाए बंजारा' को जारी रक्खा जाए । इसीलिए मित्रों, प्रोफाइल हमारा है लेकिन ज्यादातर आलेख मेरे प्रिय मित्र संजीव रंजन के रहेंगे। सहलेखन को आजकल साहित्य जगत में मान्यता मिल गयी है तो फ़िर blogging की दुनिया में क्यों नहीं। कभी-कभी मैं और हमारे अन्य मित्र भी इस ब्लॉग पर लिखा करेंगे।
अब संजीव रंजन 'गाता जाए बंजारा ' पर अपने ब्लॉग को पोस्ट कर इसका शुभारम्भ करेंगे।