Monday, March 9, 2009

है ख़बर गर्म मेरे आने की ...

तुमने तो कमबख्त दुन्दुभी बजा दी. और यहाँ आलम है कि कथा को मैं जितना खोद रहा हूँ नामुराद उतनी हीं धंसती जा रही है. तुमको याद हो कि न हो, जेएनयू दिनों कि एक बहकी शाम को मैंने फैज़ साहब का एक शेर बड़े विकल मन से तुमको सुनाया था - एक कड़ा दर्द जो गीत बनता हीं नहीं, दिल के तारीक़ शिगाफों से निकलता हीं नहीं. उस पर तुमने उनकी दूसरी ग़ज़ल को गा-के सुनाया था. याद है न वो ग़ज़ल - 'और कुछ देर में आकर मेरे तन्हा दिल को, फिक्र आ लेगा कि तन्हाई का क्या चारा करें, दर्द आएगा दबे पाँव लिए सुर्ख चिराग, वो जो इक दर्द धड़कता है मेरे दिल से परे'. तुम्हारे मुनीर नियाजी हमारी कैफियत पर कहते - लाई है अब उडा के गए मौसमों की बास'. बहरहाल, मैं संकट में तो था हीं, तुम्हारे ऐलान के बाद से बेल्लाग खतरे में आ गया हूँ. आगे अल्लाह मालिक है ... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

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