यह कविता मैंने १९९१ में मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान लिखी थी । मेरे अवचेतन में मुक्तिबोध की लम्बी कविता "अंधेरे में' थी जिससे मैं काफी प्रभावित था। यह कविता को मैंने एक बड़े पोस्टर पर लिखकर और इसके साथ अपनी एक कलाकृति जो अभी मिल नहीं पा रही, 'प्रतिबिम्ब' नामक ' wall journal' पर प्रर्दशित किया था। कई हिन्दी-दां मित्र ( जिन्होंने हिन्दी साहित्य का वैकल्पिक विषय लिया था और मुक्तिबोध की कविता पढ़ी थी ( मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में थी), मुझपर यह आरोप लगाया की मैंने इसे अंधेरे में से 'चुराई ' है या उसका एक तरह से कॉपी किया है। सच्चाई यह है कि मसूरी के ठण्ड से जूझते हुए शराब के शुरूर में मैंने इसे एक लम्बी बैठक में लिखा और इसका एकमात्र गवाह मेरे मित्र श्री अमित यादव (भारतीय प्रसाशनिक सेवा) हैं जो अभी दिल्ली में वाणिज्य मंत्रालय में निदेशक हैं। उन्होंने मुक्तिबोध की 'अंधेरे में ' नहीं पढ़ी थी , लेकिन मेरी कविता सुनकर प्रभावित जरूर हुए थे। मैं स्वीकार करता हूँ कि शैली और शिल्प में मेरी कविता मुक्तिबोध से जरूर प्रभावित है लेकिन इसकी प्रेरणा और मनः स्थिति बिल्कुल अलग है। मैं अपने आप को मुक्तिबोध जैसे कवि, साहित्यकार और चिन्तक के समक्ष तुच्छ मानता हूँ। तुलना करना निरा पागलपन होगा! खैर , इस आरोप और एक ग्लानि-बोध से मैं अभी तक मुक्त नहीं हो पाया . कहीं यह कविता दूसरी अनेक कविताओं की तरह खो न जाए इसीलिये इसे पोस्ट कर रहा हूँ। सिसीफस एक यूनानी मिथकीय पात्र है । अलबर्ट कामू ने इसपर एक किताब भी लिखी है. वे पाठक जिन्होंने 'अंधेरे में ' पढ़ी है, वे स्वतंत्र रूप से मुझे पुनः आरोपित कर सकते हैं । सबसे बड़ी बात , यह कविता मुक्तिबोध को समर्पित है और 'मुक्तिबोध से क्षमा याचना' के साथ प्रस्तुत है।
सिसीफस जिन्दा है
" रोज रात
अपने थके-हारे दिलो-दिमाग को
थपकियाँ देकर जब मैं
सुलाने की कोशिश करता हूँ
तब
वह अचानक न जाने कहाँ से
आ जाता है मेरे अंधेरे कमरे में
खड़ा हो जाता है मेरे सिरहाने
और
झिंझोड़कर, तोड़ डालता है मेरी तंद्रा
मैं नहीं चाहता कि जाग जाऊं
इतनी थकान-परेशानी के बाद
मैं नहीं चाहता उससे बातें करना
फिर भी
वह जगा ही डालता है मुझे
उँगलियाँ पकड़कर मेरी
ले जाता मुझे न जाने कहाँ ...
और मैं
जैसे किसी मंत्र से सम्मोहित
किसी सुगंध पर मुग्ध
आत्मविस्मृत सा ...
खिंचता चलता जाता हूँ उसके पीछे-पीछे
शहर से दूर ...जंगलों के पार
घाटियों के पास कहीं
जहाँ मुर्दे दफ़न होते हैं
चिल्लाते हैं भेड़िये , सियार और उल्लू जहाँ
बिच्छु और विषधर विचरते हैं ।
उस अंधियारे में वैसे नारकीय दृश्य को
नहीं सहन कर पता मैं
चिल्लाता हूँ, भागना चाहता हूँ वहां से
लेकिन वह रोक लेता है मुझे
कहता है , यह तुम्हारी ही दुनिया है
तेरे ही स्वप्न और आकांक्षाएं दफ़न हैं यहाँ
जमींदोज हैं तेरे पूर्वज , रिश्ते-नाते और दोस्त-मुहिम
तेरी ही आत्मा की कब्रगाह है यह !
मैं नहीं मानता
नहीं-नहीं , मेरी दुनिया नहीं है यह
वह तो है, जहाँ हैं -
ऊंची इमारतें , गाडियाँ , चक्करदार सीढीयाँ
गलीचे, गुलदस्ते और रंग-बिरंगी तितलियाँ
भीड़-भाड़, नियम-कानून , आदेश-प्रावधान
अफसरान-लीडरान और वे ढेर सारी चीज़ें
नहीं-नहीं , मेरी दुनिया कहीं और है !
उस सर्द रात में जड़ देता है वह
मेरे गालों पर एक ज़ोरदार तमाचा
और कहता है...
तुम खो गए हो कहीं एक भूलभूलैए में
गुम हो गए हो किन्हीं पुरपेंच गलियों में
जहाँ आदमी नहीं प्रेत डोलते हैं
मन नहीं मशीन बोलते हैं !
उसकी आवाज़ में गाम्भीर्य है
बातों में सच्चाई है
मैं कोई तर्क नहीं देता
सर झुककर स्वीकार करता हूँ उसकी बातें !
वह कहता है...
देख
रोज़ तू हत्या करता है अपने सपनों की
गला घोंटता है अपनी आकाँक्षाओं का
धोखा देता है स्वयं को
क्या नहीं है यह आत्म-प्रवंचना ?
तेरे कर्मों का फल भुगत रहा हूँ मैं ,
इन घाटियों में मारा-फिर रहा हूँ अकेला
तेरे मृत स्वप्नों का बोझ ढोता हूँ अपने सर पर
ले जाता हूँ उन्हें , घाटियों के पार , उस चोटी पर
ताकि वे जीवित हो उठें
फलित हों , पूर्ण हों सपने तेरे
मगर मैं असफल हूँ भाई मेरे
तेरे सपनों के चट्टान बहुत भारी हैं
कोशिश करता हूँ ...
पर लड़खड़ा जाता हूँ
वे गिरकर लुढ़क जाते हैं नीचे
फिर , उठाकर मैं कोशिश करता हूँ
ऊपर , चोटी पर ले जाने की उन्हें
यह क्रम चल ही रहा है...
अनवरत...अंतहीन!
और मैं असफल !
मैं कुछ नहीं कहता ....
मुझे तरस आता है उसपर
आँखें नम हो जाती हैं
पर कुछ नहीं करता मैं !
कुछ नहीं कह पता मैं !
भय सा लगता है उससे मुझे
क्योंकि , उसके सवालों के जवाब
नहीं हैं मेरे पास
मैं लौट जाना चाहता हूँ
अपने आरामदायी बिस्तर पर
भूल जाना चाहता हूँ उसे
लेकिन
रोज रात
जब मैं थपकियाँ देकर
सुलाने की कोशिश किया करता हूँ--
अपने स्वप्नों - आकाँक्षाओं को
वह खड़ा हो जाता है मेरे सिरहाने
जगा डालता है मुझे वह
मेरे ही भीतर , पला-बढ़ा आदमी
मेरे ही स्वप्नों का मूर्त-रूप वह
आत्मचेतना का पुंज
मेरी ही छाया, मेरा प्रतिरूप
मेरा मन- मनु वह
शापग्रस्त सिसीफस
जो रोज रात
शहर से दूर
घाटियों के पार कहीं
चट्टानें ढोता है ! "
सिसीफस जिन्दा है
" रोज रात
अपने थके-हारे दिलो-दिमाग को
थपकियाँ देकर जब मैं
सुलाने की कोशिश करता हूँ
तब
वह अचानक न जाने कहाँ से
आ जाता है मेरे अंधेरे कमरे में
खड़ा हो जाता है मेरे सिरहाने
और
झिंझोड़कर, तोड़ डालता है मेरी तंद्रा
मैं नहीं चाहता कि जाग जाऊं
इतनी थकान-परेशानी के बाद
मैं नहीं चाहता उससे बातें करना
फिर भी
वह जगा ही डालता है मुझे
उँगलियाँ पकड़कर मेरी
ले जाता मुझे न जाने कहाँ ...
और मैं
जैसे किसी मंत्र से सम्मोहित
किसी सुगंध पर मुग्ध
आत्मविस्मृत सा ...
खिंचता चलता जाता हूँ उसके पीछे-पीछे
शहर से दूर ...जंगलों के पार
घाटियों के पास कहीं
जहाँ मुर्दे दफ़न होते हैं
चिल्लाते हैं भेड़िये , सियार और उल्लू जहाँ
बिच्छु और विषधर विचरते हैं ।
उस अंधियारे में वैसे नारकीय दृश्य को
नहीं सहन कर पता मैं
चिल्लाता हूँ, भागना चाहता हूँ वहां से
लेकिन वह रोक लेता है मुझे
कहता है , यह तुम्हारी ही दुनिया है
तेरे ही स्वप्न और आकांक्षाएं दफ़न हैं यहाँ
जमींदोज हैं तेरे पूर्वज , रिश्ते-नाते और दोस्त-मुहिम
तेरी ही आत्मा की कब्रगाह है यह !
मैं नहीं मानता
नहीं-नहीं , मेरी दुनिया नहीं है यह
वह तो है, जहाँ हैं -
ऊंची इमारतें , गाडियाँ , चक्करदार सीढीयाँ
गलीचे, गुलदस्ते और रंग-बिरंगी तितलियाँ
भीड़-भाड़, नियम-कानून , आदेश-प्रावधान
अफसरान-लीडरान और वे ढेर सारी चीज़ें
नहीं-नहीं , मेरी दुनिया कहीं और है !
उस सर्द रात में जड़ देता है वह
मेरे गालों पर एक ज़ोरदार तमाचा
और कहता है...
तुम खो गए हो कहीं एक भूलभूलैए में
गुम हो गए हो किन्हीं पुरपेंच गलियों में
जहाँ आदमी नहीं प्रेत डोलते हैं
मन नहीं मशीन बोलते हैं !
उसकी आवाज़ में गाम्भीर्य है
बातों में सच्चाई है
मैं कोई तर्क नहीं देता
सर झुककर स्वीकार करता हूँ उसकी बातें !
वह कहता है...
देख
रोज़ तू हत्या करता है अपने सपनों की
गला घोंटता है अपनी आकाँक्षाओं का
धोखा देता है स्वयं को
क्या नहीं है यह आत्म-प्रवंचना ?
तेरे कर्मों का फल भुगत रहा हूँ मैं ,
इन घाटियों में मारा-फिर रहा हूँ अकेला
तेरे मृत स्वप्नों का बोझ ढोता हूँ अपने सर पर
ले जाता हूँ उन्हें , घाटियों के पार , उस चोटी पर
ताकि वे जीवित हो उठें
फलित हों , पूर्ण हों सपने तेरे
मगर मैं असफल हूँ भाई मेरे
तेरे सपनों के चट्टान बहुत भारी हैं
कोशिश करता हूँ ...
पर लड़खड़ा जाता हूँ
वे गिरकर लुढ़क जाते हैं नीचे
फिर , उठाकर मैं कोशिश करता हूँ
ऊपर , चोटी पर ले जाने की उन्हें
यह क्रम चल ही रहा है...
अनवरत...अंतहीन!
और मैं असफल !
मैं कुछ नहीं कहता ....
मुझे तरस आता है उसपर
आँखें नम हो जाती हैं
पर कुछ नहीं करता मैं !
कुछ नहीं कह पता मैं !
भय सा लगता है उससे मुझे
क्योंकि , उसके सवालों के जवाब
नहीं हैं मेरे पास
मैं लौट जाना चाहता हूँ
अपने आरामदायी बिस्तर पर
भूल जाना चाहता हूँ उसे
लेकिन
रोज रात
जब मैं थपकियाँ देकर
सुलाने की कोशिश किया करता हूँ--
अपने स्वप्नों - आकाँक्षाओं को
वह खड़ा हो जाता है मेरे सिरहाने
जगा डालता है मुझे वह
मेरे ही भीतर , पला-बढ़ा आदमी
मेरे ही स्वप्नों का मूर्त-रूप वह
आत्मचेतना का पुंज
मेरी ही छाया, मेरा प्रतिरूप
मेरा मन- मनु वह
शापग्रस्त सिसीफस
जो रोज रात
शहर से दूर
घाटियों के पार कहीं
चट्टानें ढोता है ! "
प्रिय सुजीत,
ReplyDeleteमुझे हैरानी है 'सीसिफस जिंदा है' जैसी उम्दा कविता लिखने के बाद भी कवि के मन में प्रायश्चित का भाव क्यों है. माना कि कोई इस कविता में मुक्तिबोध के चिंतन और उनकी काव्य-शैली का असर देख ले, किन्तु क्या इसी बिना पर यह मानना उचित होगा कि इस कविता का उत्स कवि के मन में न होकर कहीं और है. आपकी ईमानदारी आपकी निर्द्वंद्व मानवीय संवेदना का सूचक तो हो सकती है, किसी के अनुकरण की ललक का नतीजा नहीं. यह सुन्दर कविता कवि से किसी प्रस्तावना की मोहताज नहीं है. कहने दीजिये लोगों को जो वे कहना चाहते हैं. मैं तो यही कहूँगा कि आप सिर्फ लिखते रहे. मैंने अर्जी डाल दी, आगे आपकी मर्जी.
वीरेन्द्र