Monday, March 16, 2009

एक कविता

खैर मित्र संजीव रंजन ने अपनी कविता से इस ब्लॉग की अच्छी शुरुआत की। अपने व्यस्त जीवन और इसके जंजाल में फँसे और बौखलाए मन और धुंधली दृष्टि को कहाँ समय मिलता है एक नन्हे से पौध के पनपते, उगते, प्रस्फुटित होते जीवन को देखने और उससे संवेदित होने की ?
मौका मिला है तो मैं भी एक पुरानी कविता पेश कर देता हूँ:


" कहानी है यह एक छोटे बच्चे की,
जो एक रात, नानी की गोद मैं बैठा,
लोरी में बेसुध,
ढूध-भात खाते,
कटोरी में देख चाँद की परछाई,
चाँद को लेने की जिद कर बैठा,
सारे मनौव्वल , मनुहार नानी के हार गए,
वह न माना !
अपनी जिद में , रोते रहा ...रोते रहा
और , रोते-रोते सो गया।
.......आज भी,
अपने हांथों में लिए,
गुच्छे गुलमुहर के,

पंखुरियां पलाश की ,
दौड़ता फिरता है
अमलतास के फूलों से ढकी सड़कों पर,
...रोज़ रात देर तलक, पीछा किया करता है चाँद का वह,
सफर चाँद का ख़त्म हो जाता है,
जुस्तजू चाँद की ख़त्म नहीं होती उसकी ! "


(यह कविता तकरीबन बीस साल पुरानी है , यह लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी , मसूरी के इन-हाउस पत्रिका ' स्मृति' में १९९१ में छापी थी। मैंने अपनी धुंदली स्मृति से इसे बाहर निकाल , कहीं कहीं कुछ परिवर्तन कर इसे फिर से पेश किया है।)

7 comments:

  1. कविता की यह जूगलबंदी तो ,मित्र हमें निः शब्द ( शब्द के लिए माफ़ करेंगें ) कर दिया है.
    कल्पना और कोमल भावों की इस उडान के क्या कहने .
    इसी तरह लिखते रहें .
    और सुजीत जी patnagandhi मैदान पर भी अपनी टिपण्णी पोस्ट करें.

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  3. bahut achchi rachna. aapka blog jagat men swagathai.

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