Friday, April 17, 2009

बहुत कठिन थी डगर पनघट की: B. N. कॉलेज की यादें

मित्र कौशल ने बिहारी विद्यार्थियों के दिल्ली जाने के शुरुआती दौर , उस समय के बिहार के (खासकर पटना के) कॉलेज और पटना विश्वविद्यालय की स्थिति और विषिस्ठ सामाजिक - आर्थिक और राजनीतिक कारणों की चर्चा कर एक विचार-विमर्श का प्रारंभ किया है. मैंने भी पटना में स्नातक की पढ़ाई की है इसीलिये कौशल जी ने मेरे अनुभवों को पोस्ट करने को कहा. मैं अपने B. N. College के अनुभवों को लिख रहा हूँ. )

मैंने १९८१ में रांची से intermediate (विज्ञान) किया . उसी दौरान मेरी रूचि सामाजिक विज्ञान की ओर बढ़ी और समाजशास्त्र (sociology) पदने के लिए पटना गया. सच कहूं तो मुझे रांची छोड़ना था और मैंने ऐसा विषय चुना जिसकी पढाई रांची विश्वविद्यालय में नहीं थी. पटना में सिर्फ एक ही करीबी दोस्त था जो बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में mechanical इंजीनियरिंग पढ़ रहा था. उसने उसी समय admission लिया था और मुस्सलह पुर हाट के एक लौज में रहता था. मेरा दोस्त पटना में दो साल गुजार चुका था क्योंकि वह मुझसे सीनियर था और I.Sc. की पढ़ाई उसने साइंस कॉलेज से की थी हालाँकि वह लौज में ही रहता था. उसने मुझे पटना दिखाया -घुमाया. अशोक राजपथ, बोरिंग केनाल रोड, कदम कुआँ , गाँधी मैदान, गोल घर, गंगा घाट, सिनेमा घर, आदि आदि.
गाँधी मैदान का एक खास आकर्षण था : रोज़ शाम को एक आदमी अपना मजमा लगता था जैसे कोई मदारी. उसके चारो तरफ हरेक उम्र के लोग कौतुहल और विमुग्ध होकर उसकी बातें सुनते थे. बहुतों के लिए यह शाम गुजारने का मुफ्त मनोरंजन था. वह काफी हँसता -हँसाता था . वह एक खास नुस्खे की दवा बेचता था : यौन शक्ति बढ़ाने की दवा. उसका दावा था की उस दवा के ताकत से बूढा अधमरा व्यक्ति भी खटिया तोड़ सकता है. हमें तो उस दवा की जरूरत तो थी नहीं, जरूरत थी उस यौन मायालोक के तिलस्मी मनोरंजन की .
कभी-कभी हम नाश्ते के लिए अशोक राजपथ जाते थे. हम collegiate वाली गली के समोसे और जलेबा (जलेबी स्त्रीलिंग तो जलेबा अपनी विराटता के लिए जलेबा) के मुरीद थे. मेरे एक मित्र ने हाल में बताया की श्री लल्लू प्रसाद यादव ने एक बार "रैली' नहीं " रैला" निकाला. पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने बताया की " रैला" रैली का husband है. खैर, वहां विद्यार्थियों का हुजूम लगा रहता था खासकर पटना में कोचिंग लेने वाले विद्यार्थ्यीयों से. उस वक्त के कोचिंग स्कूल्स का व्यवसाय जोरों से शुरू हुआ था क्योंकि हमारे हमउम्र के विद्यार्थियों का और खासकर उनके अभिभावकों का सपना होता था : मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला. यह शिक्षा के व्यापक व्यवसायीकरण का शुरुआती दौर था.
पटना विश्वविद्यालय में उस समय B. A. का admission शुरू नहीं हुआ था. खैर एक दो महीने के बाद मेरे दोस्त को हॉस्टल मिल गया जो law college के पास था और मजबूरन मुझे भी उसके साथ वहां रहना पड़ा. हॉस्टल में आकर पता चला की वह हॉस्टल तथाकतित scheduled castes और Backward castes के लिए अनौपचारिक रूप से आरक्षित था. law college पर उसी तरह ऊँचे वर्णों का वर्चस्व था. धीरे धीरे मुझे थोड़ी -थोड़ी जातिय समीकरण और छात्रालयों में उनकी प्रभुता या प्रभुत्व जमाने की होड़ समझ में आने lagee . मुझे पता चला कि फॉरवर्ड जाति-वर्ग में राजपूत और भूमिहार के बीच नहीं पटती. संक्षिप्त में कहा जाये तो एक और राजपूत-भूमिहार के बीच का दरार और उससे उपजी हिंसा तो दूसरी तरफ फोर्वार्ड और बैक्वार्ड जातियों का उभरता हुआ ध्रुवीकरण ओर इस प्रक्रिया के पीछे प्रशासनिक, शासकीय ओर पार्टीगत राजनीति का परिदृश्य !
मजे की बात यह की मेरा दोस्त Backward जाति का था और हम दोनों में जातिगत कोई भावना ही नहीं थी क्योंकि हम बचपन के दोस्त थे. लेकिन उसने मुझे अपने हॉस्टल में 'Backward' घोषित कर दिया. मेरे survival के लिए यह एक मामूली सा समझौता था जो मुझे कभी अखरा भी नहीं और मेरा surname भी इतना सर्वव्यापी था की किसीको कोई शक नहीं हुआ. उस हॉस्टल के मुखिया थे वीर सिंह (नाम बदला है ) उसे मेरी ग़ज़लें पसंद थी . वह एक बुद्धिमान और प्रतिभाशाली विद्यार्थी था जो धीरे-धीरे जातिगत हिंसा के दलदल में फंसता जा रहा था. वर्तमान में मिलने वाला दबदबा उसकी हौसला-आफज़ाई कर रहा था. उसने एक दिन मुझे देसी तमंचा दिखाया और एक दिन जब सिर्फ हम दोनों अकेले थे तो उसने कहा मैं जानता हूँ तुम Backward नहीं हो लेकिन यह राज राज ही रहे. उसदिन के बाद मैं और मेरा दोस्त काफी सहमे रहते थे की किसी तरह मेरा राज न खुल जाए .
खैर थोड़े दिनों में मुझे B. N. college के हॉस्टल में दाखिला मिल गया. मैंने B. N. college में इस लिए दाखिला लिया था क्योंकि कुछ सीनियर विद्यार्थिओं के सुझाव के मुताबिक, वहां का sociology विभाग पटना college से बेहतर था. हॉस्टल काफी भब्य था बिलकुल college के पास. हॉस्टल के वार्डेन जो मेरे विभागाद्ययक्ष भी थे मेरे पिताजी को जानते थे और उन्होंने एक अच्छा (?) सा कमरा allot कर दिया. पहले ही दिन जब मैंने अपना सामान रखकर बड़े से गोदरेज ताले से कमरा बंद कर गाँधी मैदान जाकर और वहां की घास पर लेटकर वापस लौटा तो पाया की कमरे की चाभी गाँधी मैदान में खो गयी है. वापस मैदान में ढूँढने की कोशिश नाकाम रही. लाचार होकर सब्जी बाग़ गया और लोहा काटने का ब्लेड खरीदा और दो घंटे लगे , गोदरेज का ताला काटने में. हॉस्टल में मैं किसीको नहीं जानता था. दो-तीन बाद एक नया रूममेट आया , जाति का राजपूत, उद्दंड स्वाभाव और राजधानी के मौजूदा फैशन से कदम से कदम मिलाने वाला. हालाँकि, अपने क्लास में कुछ day scholars से मित्रता बढ़ी और अकेलापन कम होने लगा. मेस में कुछ और मित्र बने.
मेस में मैथिल बावर्ची और कर्मचारी थे. मेरे कमरे की खिड़की मेस की ओर खुलता था. अपना कम खतम कर वे गांजा -बीडी पीते और जोर जोर से बतियाते थे जो मेरे पोस्ट-लंच siesta में खलल डालता था. मेरी काफी झड़पे होती थीं. मेस का एक आकर्षण था : आलू का कुरकुरा ( छना हुआ ) भुंजिया , जो सभी काफी चटक से खाते थे. कुछ मित्र अपने साथ अचार और घी लाते थे . हाँ, एक चीज़ मेरी नज़र में पड़ी की कुछ खास लोगों के लिए खास खाना banta था और उन्हें रूम-सर्विस की सुविधा थी. कौन थे वे लोग ?
थोड़े दिनों में पता चला की हॉस्टल के तीन blocks तीन जाति वर्गों पर आधारित थे. एक ब्लाक पर राजपूतों का वर्चस्व था तो दुसरे पर भूमिहारों का कब्ज़ा. मेरा ब्लाक थोडा मिश्रित था तब पता चला वार्डेन ने मुझे उस ब्लाक में क्यों कमरा क्यों दिया. हॉस्टल के पास अशोक राजपथ के कोने पर एक पान की दूकान थी जहाँ राजपूतों का नेता खादी का कुरता पजामा पहन अपना अड्डा लगाता था. देखने में वह शालीन था और दाढी के कारण उसमे एक गाम्भीर्य था. मैंने सुना था कि वह रात में रिक्शा लेकर (बगल में ही रिक्शे वालों का पडाव था) और रिक्शा चालक के भेष में प्रिया सिनेमा जाता था और सिर्फ लड़कियों या कमउम्र महिलाओं को उनके घर छोड़ता था. सवारी करते करते वह शुद्ध हिंदी या अंग्रेजी में बातें करता. आश्चर्यचकित सवार हुई महिलाओं या लड़कियों से पूछे
जाने पर बताता की वह एक गरीब विद्यार्थी है जो दिन में पदाई करता है और रात को रिक्सा चलाता है. यह दिल जीतने और दिलफरेबी का नायाब नमूना था. मैंने यह भी सुना था की वह बुरका पहन सब्जी बाग के उस हिस्से में घूमता था जहाँ चूड़ी-बिंदी बिकती थी ओर खरीददारों में महिलाएं ही होती थीं.
हमारा कॉलेज co-ed नहीं होने के कारन एक 'हीन भावना' से ग्रस्त था जो विभिन्न रूपों में परिलक्षित होता था. कुछ विद्यार्थी स्टुडेंट स्पेशल बसों में छेड़खानी करते या सड़क के पास खड़े होकर आती-जाती लड़कियों पर फब्तियां कसते. होली जब करीब आती तो रिक्सा =बसों से सफ़र करती लड़कियों पर गुलाला भी फेंका जाता.
झुंड-मानशिकता से अलग एक और घटना याद आती है. मेरा एक दोस्त जो अंग्रेजी साहित्य का विद्यार्थी था , सेक्स से काफी obsessed था . वह गोविन्द मित्र रोड के पास एक lodge में रहता था जहाँ ज्यादातर medial स्टूडेंट्स रहते थे. एकदिन सबेरे-सबेरे उसने मेरा दरवाज़ा खटखटाया , चेहरा फुला और खूनी खरोंचों से भरा. पता चला कि हमारे मित्र के कमरे के बगल में एक मेडिकल विद्यार्थी थे जिनकी नयी नयी शादी हुई थी और उन्होंने अपनी नयी नवेली पत्नी को lodge में कुछ दिनों के लिए ले आये थे . मेरे मित्र सारी रात प्रेम और काम क्रीडा की कल्पना करते रहे और जब उसे और सब्र नहीं रहा तो उसने गर्मियों के मौसम के उस रात में अधखुली
खिड़की से अन्दर झाँकने की कोशिश की . उस विद्यार्थी ने उसे देख लिया और उसकी जम कर पिटाई की. मुझे अपने मित्र पर दया आयी मगर मैं यह नहीं समझ नहीं पाया की जो लड़का एक ओर नुक्कड़ नाटक करता है और मुझसे wordsworth और milton की बातें करता है वह ऐसी हरकत भी कर सकता है. शायद दोष उसका नहीं उस सामाजिक वातावरण का था.
हमारे कॉलेज के पास गंगा घाट भी था. छठ पर्व के दिन हम रास्ते पर बाकायदा चादर बिछा देते और ठेन्कुँआँ मांगते. यह तकरीबन एक सप्ताह तक हमारे नाश्ते में काम आता.
उसी दौरान क्रिकेट और टीवी का प्रवेश हुआ . भारत ने कपिलदेव के नेतृत्व में विश्व कप जीता और आधी रात को मेरे एक मित्र ने (जो अब railways में उच्चाधिकारी हैं ) भारत के गर्व से गौरवान्वित होकर अपना वस्त्र उतार , बिलकुल नग्न होकर हॉस्टल की चौहद्दी की परिक्रमा की ओर हॉस्टल से पान दूकान तक दौड़ लगाकर एक नयी मिसाल कायम की.
कुछ विद्यार्थी प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित होकर नुक्कड़ नाटक करते थे. मैंने भी एक लघु पत्रिका में प्रकाश झा की फिल्म "दामुल" पर एक लेख लिखी थी.
इन सब नवयुवक सुलभ बातों-व्यवहारों के बीच हिंसा की पौध भी tejee से पनप रही थी. रंगदार विद्यार्थियों का एक झुंड अशोक राजपथ के दूकानों से बिना पैसा दिए सामान ले लेता था. उसी दौरान हमारे हॉस्टल में राजपूत और भूमिहार गुटों के बीच घमासान संघर्ष शुरू हुआ. यह एक लम्बा सिलसिला था. शाम को जब वापस हॉस्टल आता तो पता चलता की बमबारी हुई है और विद्यार्थीयों की जगह पुलिस दिखाई देते. हॉस्टल खाली करा दिया जाता और पहली बार एक नया शब्द सुना: sine die . हॉस्टल में पुलिस की बंदोबस्त होने लगी. ऐसा कई बार या यो kahen बार-बार होने लगा. फिर मैंने सुना की बैकॅवाङ - फॉरवर्ड के संघर्ष में वीर सिंह बुरी तरह जख्मी हो गया . मुश्किल से जान बची. मैं उससे मिलने PMCH भी गया.

इन्ही परिस्थितियों के बीच हमारी पढाई हो रही थी. हमारी B. A. (Hons) की परीक्षा करीब आ गयी . असली प्रतियोगिता हमारे और पटना कॉलेज के बीच थी. हमलोग अपने सूत्रों से यह पता लगाने की कोशिश करते की पटना कॉलेज में topper होने का कौन दावेदार है. सच कहूं तो मित्र बीरू का नाम सामने आया . उनसे मेरे कभी मुलाकात नहीं हुई हाँ वर्षों बाद वे जेएनयू में मेरे मित्र बने और अभी भी मित्र हैं.
पुलिस बंदोबस्त के बीच व्हीलर सीनेट हॉल में परीक्षा हुई और नतीजा भी आया . मैं प्रथम श्रेणी में द्वितीय स्थान पर था और प्रथम स्थान पर एक ऐसा विद्यार्थी था जिसे कोइ जानता भी नहीं था. सुना की वह कुलपति या उपकुलपति का दामाद था . उसकी बहुत ऊँची पहुँच थी और इसीलिये वह बना topper!

आज इतने वर्षों के बाद उन बातों को याद कर एक मिश्रित , कुछ आसक्त कुछ निरासक्त भावना उमगती है . अगर मैं राजपूत, भूमिहार या अन्य जातीय गुट में शामिल होने को मजबूर होता तो क्या होता ? कितना संकीर्ण फासला था सही या गलत रास्तों में ? उस उम्र में भला कितनी वैचारिक परिपक्वता थी , सही और गलत के फर्क को समझने में ? सचमुच " बहुत कठिन थी डगर पनघट की."

Sunday, March 22, 2009

माँ का घर और माँ की स्मृति


माँ का घर और माँ की स्मृति




(मित्र कौशल किशोर ने अपने ब्लॉग 'पटना गाँधी मैदान ' http://www.patnagandhimaidan.blogspot.com/पर अत्यन्त मार्मिक संस्मरण लिखा है कौशल अपनी बातों में माँ का जिक्र अक्सर किया करते हैं। उनकाविश्वास है की उनका जीवन और उनके परिवार की उन्नति उनकी माँ के परिश्रम और बड़े सपनों के दखने के साहस का प्रतिफल हैवह एक कर्मठ और प्रगतिशील महिला थीं - अपनी पीढी और सामाजिक परिप्रेक्ष्य से काफी आगे। उनकी असमय मृत्यु हो गयी और उनके जीवन का एक लंबा सक्रिय दौर अधूरा रह गया। यह संस्मरण कौशल का व्यक्तिगत है मगर जो मुद्दे उन्होंने उठाये हैं, वे सामाजिक, जागतिक महत्व के हैं। पुराने संभ्रांत परिवार, पीढी दर पीढी का बदलाव, शहरीकरण, आधुनिक शिक्षा का प्रभाव, गाँव से सामाजिक-आर्थिक रिश्तों का टूटना या उनके टूटने कि चरमराहट आदि आदि. मित्र संजीव रंजन ने उनसे अनुमति लेकर मुझे उनका ब्लॉग 'गाताजाएबंजारा ' पर पोस्ट करने को कहा है। )

माँ को गुजरे हुए डेढ़ दशक हो गयाएक दुर्घटना में माँ अचानक चल बसीमार्च के महीने में माँ हर रोज़ याद आती हैं पिछले जून में घर से लौटते समय रास्ते में माँ के घर पर नजर पड़ी. घर की वर्तमान दशा मन में यादों की बारात ले आया. साथ में कैमरा था. सोचा दूर से ही सही इसकी एक तस्वीर उतार लूं
घर १९३४ में मेरे नाना ने बनबाया था. उस दौर में इलाके भर में इकलौता भव्य मकान. बैठक खाने की फर्श में संगमरमर का काम. उसके एक साल बाद माँ का जन्म हुआ. संयुक्त परिवार - दो भाईयों के बीच में नौ संताने, माँआठवें नंबर पर. कुल चार भाई और पांच बहनें. कहते हैं की माँ के जन्म के बाद मेरे ननिहाल में धन और यश दोनोंकी भारी वृद्धि हुई. फतुहा, कलकत्ता से लेकर ढाका तक से व्यापार हुआ. ग्रामीण और कस्बाई समाज में शानो-शौकत के सारे संसाधन जुटाए गए१९४२ तक शहर में ठौर ठिकाना, घोडा, बन्दूक, जमींदारी, बड़े संतान की BHU से वकालत की पढ़ाई. चार भाईयों में, वकील, किसान, प्रोफ़ेसर और डॉक्टर बने. माँ से बड़ी तीन बहनों की शिक्षा पांचवी तक पाठशाले पर और १९३८ तक उन सब की शादी. दो बहनों की खगडिया के एक प्रगतिशील समृद्ध परिवार मेंशादी. परिवार स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी शरीक रहा. यह परिवार राजनीति में बारास्ता विधायक ( पांच बार ) मंत्री पद तक पंहुचा . माँ से ठीक बड़ी बहन की शिक्षा सन चालीस से चौआलिस तक पटना के एकमात्र बालिकाआवासीय विद्यालय में हुई.
सन पचास के बाद भी माँ के घर के वारिशों का रसूख बढ़ता रहा. दूसरी पीढी ने भी तरक्की की - डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, व्यापार, बहुराष्ट्रीय कम्पनी, सब ओर. माँ इसी घर में पली और बढ़ी. लेकिन आज माँ के घर की हालत देखिये. ऐसा नहीं है की इस घर को वारिसों ने बेंच दिया है. मालिकान हक़ बरकरार है. आज भी धन-धान्य से परिपूर्ण. अर्थ, शिक्षा, राजनीति और सामजिक हैसियत. पर यह पारिवारिक विरासत बदहाल क्यों? क्यों इसकी तस्वीर धुन्धली लगती है? क्या समय के साथ माँ की पुण्य स्मृति भी उसके घर की तरह धुंधली पड़ जायगी ? सोच कर ख़ुद को बड़ा असहाय पाता हूँ

सिसीफस जिन्दा है !

यह कविता मैंने १९९१ में मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान लिखी थी । मेरे अवचेतन में मुक्तिबोध की लम्बी कविता "अंधेरे में' थी जिससे मैं काफी प्रभावित था। यह कविता को मैंने एक बड़े पोस्टर पर लिखकर और इसके साथ अपनी एक कलाकृति जो अभी मिल नहीं पा रही, 'प्रतिबिम्ब' नामक ' wall journal' पर प्रर्दशित किया था। कई हिन्दी-दां मित्र ( जिन्होंने हिन्दी साहित्य का वैकल्पिक विषय लिया था और मुक्तिबोध की कविता पढ़ी थी ( मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में थी), मुझपर यह आरोप लगाया की मैंने इसे अंधेरे में से 'चुराई ' है या उसका एक तरह से कॉपी किया है। सच्चाई यह है कि मसूरी के ठण्ड से जूझते हुए शराब के शुरूर में मैंने इसे एक लम्बी बैठक में लिखा और इसका एकमात्र गवाह मेरे मित्र श्री अमित यादव (भारतीय प्रसाशनिक सेवा) हैं जो अभी दिल्ली में वाणिज्य मंत्रालय में निदेशक हैं। उन्होंने मुक्तिबोध की 'अंधेरे में ' नहीं पढ़ी थी , लेकिन मेरी कविता सुनकर प्रभावित जरूर हुए थे। मैं स्वीकार करता हूँ कि शैली और शिल्प में मेरी कविता मुक्तिबोध से जरूर प्रभावित है लेकिन इसकी प्रेरणा और मनः स्थिति बिल्कुल अलग है। मैं अपने आप को मुक्तिबोध जैसे कवि, साहित्यकार और चिन्तक के समक्ष तुच्छ मानता हूँ। तुलना करना निरा पागलपन होगा! खैर , इस आरोप और एक ग्लानि-बोध से मैं अभी तक मुक्त नहीं हो पाया . कहीं यह कविता दूसरी अनेक कविताओं की तरह खो न जाए इसीलिये इसे पोस्ट कर रहा हूँ। सिसीफस एक यूनानी मिथकीय पात्र है । अलबर्ट कामू ने इसपर एक किताब भी लिखी है. वे पाठक जिन्होंने 'अंधेरे में ' पढ़ी है, वे स्वतंत्र रूप से मुझे पुनः आरोपित कर सकते हैं । सबसे बड़ी बात , यह कविता मुक्तिबोध को समर्पित है और 'मुक्तिबोध से क्षमा याचना' के साथ प्रस्तुत है।
सिसीफस जिन्दा है
" रोज रात
अपने थके-हारे दिलो-दिमाग को
थपकियाँ देकर जब मैं
सुलाने की कोशिश करता हूँ
तब
वह अचानक न जाने कहाँ से
आ जाता है मेरे अंधेरे कमरे में
खड़ा हो जाता है मेरे सिरहाने
और
झिंझोड़कर, तोड़ डालता है मेरी तंद्रा
मैं नहीं चाहता कि जाग जाऊं
इतनी थकान-परेशानी के बाद
मैं नहीं चाहता उससे बातें करना
फिर भी
वह जगा ही डालता है मुझे
उँगलियाँ पकड़कर मेरी
ले जाता मुझे न जाने कहाँ ...
और मैं
जैसे किसी मंत्र से सम्मोहित
किसी सुगंध पर मुग्ध
आत्मविस्मृत सा ...
खिंचता चलता जाता हूँ उसके पीछे-पीछे
शहर से दूर ...जंगलों के पार
घाटियों के पास कहीं
जहाँ मुर्दे दफ़न होते हैं
चिल्लाते हैं भेड़िये , सियार और उल्लू जहाँ
बिच्छु और विषधर विचरते हैं ।
उस अंधियारे में वैसे नारकीय दृश्य को
नहीं सहन कर पता मैं
चिल्लाता हूँ, भागना चाहता हूँ वहां से
लेकिन वह रोक लेता है मुझे
कहता है , यह तुम्हारी ही दुनिया है
तेरे ही स्वप्न और आकांक्षाएं दफ़न हैं यहाँ
जमींदोज हैं तेरे पूर्वज , रिश्ते-नाते और दोस्त-मुहिम
तेरी ही आत्मा की कब्रगाह है यह !
मैं नहीं मानता
नहीं-नहीं , मेरी दुनिया नहीं है यह
वह तो है, जहाँ हैं -
ऊंची इमारतें , गाडियाँ , चक्करदार सीढीयाँ
गलीचे, गुलदस्ते और रंग-बिरंगी तितलियाँ
भीड़-भाड़, नियम-कानून , आदेश-प्रावधान
अफसरान-लीडरान और वे ढेर सारी चीज़ें
नहीं-नहीं , मेरी दुनिया कहीं और है !
उस सर्द रात में जड़ देता है वह
मेरे गालों पर एक ज़ोरदार तमाचा
और कहता है...
तुम खो गए हो कहीं एक भूलभूलैए में
गुम हो गए हो किन्हीं पुरपेंच गलियों में
जहाँ आदमी नहीं प्रेत डोलते हैं
मन नहीं मशीन बोलते हैं !
उसकी आवाज़ में गाम्भीर्य है
बातों में सच्चाई है
मैं कोई तर्क नहीं देता
सर झुककर स्वीकार करता हूँ उसकी बातें !
वह कहता है...
देख
रोज़ तू हत्या करता है अपने सपनों की
गला घोंटता है अपनी आकाँक्षाओं का
धोखा देता है स्वयं को
क्या नहीं है यह आत्म-प्रवंचना ?
तेरे कर्मों का फल भुगत रहा हूँ मैं ,
इन घाटियों में मारा-फिर रहा हूँ अकेला
तेरे मृत स्वप्नों का बोझ ढोता हूँ अपने सर पर
ले जाता हूँ उन्हें , घाटियों के पार , उस चोटी पर
ताकि वे जीवित हो उठें
फलित हों , पूर्ण हों सपने तेरे
मगर मैं असफल हूँ भाई मेरे
तेरे सपनों के चट्टान बहुत भारी हैं
कोशिश करता हूँ ...
पर लड़खड़ा जाता हूँ
वे गिरकर लुढ़क जाते हैं नीचे
फिर , उठाकर मैं कोशिश करता हूँ
ऊपर , चोटी पर ले जाने की उन्हें
यह क्रम चल ही रहा है...
अनवरत...अंतहीन!
और मैं असफल !
मैं कुछ नहीं कहता ....
मुझे तरस आता है उसपर
आँखें नम हो जाती हैं
पर कुछ नहीं करता मैं !
कुछ नहीं कह पता मैं !
भय सा लगता है उससे मुझे
क्योंकि , उसके सवालों के जवाब
नहीं हैं मेरे पास
मैं लौट जाना चाहता हूँ
अपने आरामदायी बिस्तर पर
भूल जाना चाहता हूँ उसे
लेकिन
रोज रात
जब मैं थपकियाँ देकर
सुलाने की कोशिश किया करता हूँ--
अपने स्वप्नों - आकाँक्षाओं को
वह खड़ा हो जाता है मेरे सिरहाने
जगा डालता है मुझे वह
मेरे ही भीतर , पला-बढ़ा आदमी
मेरे ही स्वप्नों का मूर्त-रूप वह
आत्मचेतना का पुंज
मेरी ही छाया, मेरा प्रतिरूप
मेरा मन- मनु वह
शापग्रस्त सिसीफस
जो रोज रात
शहर से दूर
घाटियों के पार कहीं
चट्टानें ढोता है ! "

Monday, March 16, 2009

एक कविता

खैर मित्र संजीव रंजन ने अपनी कविता से इस ब्लॉग की अच्छी शुरुआत की। अपने व्यस्त जीवन और इसके जंजाल में फँसे और बौखलाए मन और धुंधली दृष्टि को कहाँ समय मिलता है एक नन्हे से पौध के पनपते, उगते, प्रस्फुटित होते जीवन को देखने और उससे संवेदित होने की ?
मौका मिला है तो मैं भी एक पुरानी कविता पेश कर देता हूँ:


" कहानी है यह एक छोटे बच्चे की,
जो एक रात, नानी की गोद मैं बैठा,
लोरी में बेसुध,
ढूध-भात खाते,
कटोरी में देख चाँद की परछाई,
चाँद को लेने की जिद कर बैठा,
सारे मनौव्वल , मनुहार नानी के हार गए,
वह न माना !
अपनी जिद में , रोते रहा ...रोते रहा
और , रोते-रोते सो गया।
.......आज भी,
अपने हांथों में लिए,
गुच्छे गुलमुहर के,

पंखुरियां पलाश की ,
दौड़ता फिरता है
अमलतास के फूलों से ढकी सड़कों पर,
...रोज़ रात देर तलक, पीछा किया करता है चाँद का वह,
सफर चाँद का ख़त्म हो जाता है,
जुस्तजू चाँद की ख़त्म नहीं होती उसकी ! "


(यह कविता तकरीबन बीस साल पुरानी है , यह लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी , मसूरी के इन-हाउस पत्रिका ' स्मृति' में १९९१ में छापी थी। मैंने अपनी धुंदली स्मृति से इसे बाहर निकाल , कहीं कहीं कुछ परिवर्तन कर इसे फिर से पेश किया है।)

जीना हुआ दुश्वार ...

यह कविता मेरे एक मित्र के हौसले का प्रतिफल है. मैंने टेलीफून पर कभी बात-चीत के दौरान उनसे अपने बालकनी के नीचे-के पार्किंग स्पेस में जड़ पकड़ रहे एक नन्हे वट वृक्ष के ताजा स्थिति का ज़िक्र किया था. उन्होंने कहा था कि यह कविता-सी प्रतीत हो रही है - अतः इसे पोस्ट कर रहा हूँ :


मेरी बालकनी के नीचे-के
पार्किंग स्पेस में
एक बे-आबरू कुआँ और एक नन्हा वट-वृक्ष है
ऊपर-वाले तले का किरायदार
उस पर
सुबह और शाम को
पाइप से पतले-धार की
बारिश करता है
जिससे
उसके अक्सर पत्ते
और उसका आधा से ज्यादा
किशोर धड
सतह पर भींग जाता है
नीचे की ज़मीन भींग जाती है,
पर पानी-पानी नहीं होता है
(बदहाल ज़मीन क्षण-भर में
पी जाती है)
उसका बाक़ी-का मुख्य आहार
फिनाइल आदि के मसाले-वाला
कचडे का शोरबा है
अल्ल-सुबह से देर दोपहर तक
सफाई-वाले और वालियां
ताबड़तोड़
वह शोरबा
गुटखे की पीक के साथ
उस नौनिहाल की जड़ में
पटाये जाते हैं
........
दोपहर में
कभी कुछ देर तक
उस बेजुबान को
जब देखने का अवसर होता है
तब लगता है
कि फुन्गिओं पर की
उसकी नवजात हरी पत्तियां
सिहर रहीं हैं

... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

Monday, March 9, 2009

है ख़बर गर्म मेरे आने की ...

तुमने तो कमबख्त दुन्दुभी बजा दी. और यहाँ आलम है कि कथा को मैं जितना खोद रहा हूँ नामुराद उतनी हीं धंसती जा रही है. तुमको याद हो कि न हो, जेएनयू दिनों कि एक बहकी शाम को मैंने फैज़ साहब का एक शेर बड़े विकल मन से तुमको सुनाया था - एक कड़ा दर्द जो गीत बनता हीं नहीं, दिल के तारीक़ शिगाफों से निकलता हीं नहीं. उस पर तुमने उनकी दूसरी ग़ज़ल को गा-के सुनाया था. याद है न वो ग़ज़ल - 'और कुछ देर में आकर मेरे तन्हा दिल को, फिक्र आ लेगा कि तन्हाई का क्या चारा करें, दर्द आएगा दबे पाँव लिए सुर्ख चिराग, वो जो इक दर्द धड़कता है मेरे दिल से परे'. तुम्हारे मुनीर नियाजी हमारी कैफियत पर कहते - लाई है अब उडा के गए मौसमों की बास'. बहरहाल, मैं संकट में तो था हीं, तुम्हारे ऐलान के बाद से बेल्लाग खतरे में आ गया हूँ. आगे अल्लाह मालिक है ... संजीव रंजन, मुजफ्फरपुर

इस ब्लॉग की शुरुआत

मित्र संजीव रंजन 'गाता जाए बंजारा ' की शरुआत करना चाहते थे और मैं भी इसकी तकनीकी प्रक्रिया में शामिल हो गया। ईमानदारी से कहूँ तो हम दोनों blogging के तक्नीकी जटिलताओ से वाकिफ नहीं है । हम दोनों को नौशिखिया ही समझा जाए। इसी चक्कर में हम ब्लॉग की जटिलताओं में फँस गए मगर blogging का भूत हम दोनों के सर पर इस कदर सवार है कि हमने सोचा 'गाता जाए बंजारा' को जारी रक्खा जाए । इसीलिए मित्रों, प्रोफाइल हमारा है लेकिन ज्यादातर आलेख मेरे प्रिय मित्र संजीव रंजन के रहेंगे। सहलेखन को आजकल साहित्य जगत में मान्यता मिल गयी है तो फ़िर blogging की दुनिया में क्यों नहीं। कभी-कभी मैं और हमारे अन्य मित्र भी इस ब्लॉग पर लिखा करेंगे।
अब संजीव रंजन 'गाता जाए बंजारा ' पर अपने ब्लॉग को पोस्ट कर इसका शुभारम्भ करेंगे।