मित्र कौशल ने बिहारी विद्यार्थियों के दिल्ली जाने के शुरुआती दौर , उस समय के बिहार के (खासकर पटना के) कॉलेज और पटना विश्वविद्यालय की स्थिति और विषिस्ठ सामाजिक - आर्थिक और राजनीतिक कारणों की चर्चा कर एक विचार-विमर्श का प्रारंभ किया है. मैंने भी पटना में स्नातक की पढ़ाई की है इसीलिये कौशल जी ने मेरे अनुभवों को पोस्ट करने को कहा. मैं अपने B. N. College के अनुभवों को लिख रहा हूँ. )
मैंने १९८१ में रांची से intermediate (विज्ञान) किया . उसी दौरान मेरी रूचि सामाजिक विज्ञान की ओर बढ़ी और समाजशास्त्र (sociology) पदने के लिए पटना गया. सच कहूं तो मुझे रांची छोड़ना था और मैंने ऐसा विषय चुना जिसकी पढाई रांची विश्वविद्यालय में नहीं थी. पटना में सिर्फ एक ही करीबी दोस्त था जो बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में mechanical इंजीनियरिंग पढ़ रहा था. उसने उसी समय admission लिया था और मुस्सलह पुर हाट के एक लौज में रहता था. मेरा दोस्त पटना में दो साल गुजार चुका था क्योंकि वह मुझसे सीनियर था और I.Sc. की पढ़ाई उसने साइंस कॉलेज से की थी हालाँकि वह लौज में ही रहता था. उसने मुझे पटना दिखाया -घुमाया. अशोक राजपथ, बोरिंग केनाल रोड, कदम कुआँ , गाँधी मैदान, गोल घर, गंगा घाट, सिनेमा घर, आदि आदि.
गाँधी मैदान का एक खास आकर्षण था : रोज़ शाम को एक आदमी अपना मजमा लगता था जैसे कोई मदारी. उसके चारो तरफ हरेक उम्र के लोग कौतुहल और विमुग्ध होकर उसकी बातें सुनते थे. बहुतों के लिए यह शाम गुजारने का मुफ्त मनोरंजन था. वह काफी हँसता -हँसाता था . वह एक खास नुस्खे की दवा बेचता था : यौन शक्ति बढ़ाने की दवा. उसका दावा था की उस दवा के ताकत से बूढा अधमरा व्यक्ति भी खटिया तोड़ सकता है. हमें तो उस दवा की जरूरत तो थी नहीं, जरूरत थी उस यौन मायालोक के तिलस्मी मनोरंजन की .
कभी-कभी हम नाश्ते के लिए अशोक राजपथ जाते थे. हम collegiate वाली गली के समोसे और जलेबा (जलेबी स्त्रीलिंग तो जलेबा अपनी विराटता के लिए जलेबा) के मुरीद थे. मेरे एक मित्र ने हाल में बताया की श्री लल्लू प्रसाद यादव ने एक बार "रैली' नहीं " रैला" निकाला. पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने बताया की " रैला" रैली का husband है. खैर, वहां विद्यार्थियों का हुजूम लगा रहता था खासकर पटना में कोचिंग लेने वाले विद्यार्थ्यीयों से. उस वक्त के कोचिंग स्कूल्स का व्यवसाय जोरों से शुरू हुआ था क्योंकि हमारे हमउम्र के विद्यार्थियों का और खासकर उनके अभिभावकों का सपना होता था : मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला. यह शिक्षा के व्यापक व्यवसायीकरण का शुरुआती दौर था.
पटना विश्वविद्यालय में उस समय B. A. का admission शुरू नहीं हुआ था. खैर एक दो महीने के बाद मेरे दोस्त को हॉस्टल मिल गया जो law college के पास था और मजबूरन मुझे भी उसके साथ वहां रहना पड़ा. हॉस्टल में आकर पता चला की वह हॉस्टल तथाकतित scheduled castes और Backward castes के लिए अनौपचारिक रूप से आरक्षित था. law college पर उसी तरह ऊँचे वर्णों का वर्चस्व था. धीरे धीरे मुझे थोड़ी -थोड़ी जातिय समीकरण और छात्रालयों में उनकी प्रभुता या प्रभुत्व जमाने की होड़ समझ में आने lagee . मुझे पता चला कि फॉरवर्ड जाति-वर्ग में राजपूत और भूमिहार के बीच नहीं पटती. संक्षिप्त में कहा जाये तो एक और राजपूत-भूमिहार के बीच का दरार और उससे उपजी हिंसा तो दूसरी तरफ फोर्वार्ड और बैक्वार्ड जातियों का उभरता हुआ ध्रुवीकरण ओर इस प्रक्रिया के पीछे प्रशासनिक, शासकीय ओर पार्टीगत राजनीति का परिदृश्य !
मजे की बात यह की मेरा दोस्त Backward जाति का था और हम दोनों में जातिगत कोई भावना ही नहीं थी क्योंकि हम बचपन के दोस्त थे. लेकिन उसने मुझे अपने हॉस्टल में 'Backward' घोषित कर दिया. मेरे survival के लिए यह एक मामूली सा समझौता था जो मुझे कभी अखरा भी नहीं और मेरा surname भी इतना सर्वव्यापी था की किसीको कोई शक नहीं हुआ. उस हॉस्टल के मुखिया थे वीर सिंह (नाम बदला है ) उसे मेरी ग़ज़लें पसंद थी . वह एक बुद्धिमान और प्रतिभाशाली विद्यार्थी था जो धीरे-धीरे जातिगत हिंसा के दलदल में फंसता जा रहा था. वर्तमान में मिलने वाला दबदबा उसकी हौसला-आफज़ाई कर रहा था. उसने एक दिन मुझे देसी तमंचा दिखाया और एक दिन जब सिर्फ हम दोनों अकेले थे तो उसने कहा मैं जानता हूँ तुम Backward नहीं हो लेकिन यह राज राज ही रहे. उसदिन के बाद मैं और मेरा दोस्त काफी सहमे रहते थे की किसी तरह मेरा राज न खुल जाए .
खैर थोड़े दिनों में मुझे B. N. college के हॉस्टल में दाखिला मिल गया. मैंने B. N. college में इस लिए दाखिला लिया था क्योंकि कुछ सीनियर विद्यार्थिओं के सुझाव के मुताबिक, वहां का sociology विभाग पटना college से बेहतर था. हॉस्टल काफी भब्य था बिलकुल college के पास. हॉस्टल के वार्डेन जो मेरे विभागाद्ययक्ष भी थे मेरे पिताजी को जानते थे और उन्होंने एक अच्छा (?) सा कमरा allot कर दिया. पहले ही दिन जब मैंने अपना सामान रखकर बड़े से गोदरेज ताले से कमरा बंद कर गाँधी मैदान जाकर और वहां की घास पर लेटकर वापस लौटा तो पाया की कमरे की चाभी गाँधी मैदान में खो गयी है. वापस मैदान में ढूँढने की कोशिश नाकाम रही. लाचार होकर सब्जी बाग़ गया और लोहा काटने का ब्लेड खरीदा और दो घंटे लगे , गोदरेज का ताला काटने में. हॉस्टल में मैं किसीको नहीं जानता था. दो-तीन बाद एक नया रूममेट आया , जाति का राजपूत, उद्दंड स्वाभाव और राजधानी के मौजूदा फैशन से कदम से कदम मिलाने वाला. हालाँकि, अपने क्लास में कुछ day scholars से मित्रता बढ़ी और अकेलापन कम होने लगा. मेस में कुछ और मित्र बने.
मेस में मैथिल बावर्ची और कर्मचारी थे. मेरे कमरे की खिड़की मेस की ओर खुलता था. अपना कम खतम कर वे गांजा -बीडी पीते और जोर जोर से बतियाते थे जो मेरे पोस्ट-लंच siesta में खलल डालता था. मेरी काफी झड़पे होती थीं. मेस का एक आकर्षण था : आलू का कुरकुरा ( छना हुआ ) भुंजिया , जो सभी काफी चटक से खाते थे. कुछ मित्र अपने साथ अचार और घी लाते थे . हाँ, एक चीज़ मेरी नज़र में पड़ी की कुछ खास लोगों के लिए खास खाना banta था और उन्हें रूम-सर्विस की सुविधा थी. कौन थे वे लोग ?
थोड़े दिनों में पता चला की हॉस्टल के तीन blocks तीन जाति वर्गों पर आधारित थे. एक ब्लाक पर राजपूतों का वर्चस्व था तो दुसरे पर भूमिहारों का कब्ज़ा. मेरा ब्लाक थोडा मिश्रित था तब पता चला वार्डेन ने मुझे उस ब्लाक में क्यों कमरा क्यों दिया. हॉस्टल के पास अशोक राजपथ के कोने पर एक पान की दूकान थी जहाँ राजपूतों का नेता खादी का कुरता पजामा पहन अपना अड्डा लगाता था. देखने में वह शालीन था और दाढी के कारण उसमे एक गाम्भीर्य था. मैंने सुना था कि वह रात में रिक्शा लेकर (बगल में ही रिक्शे वालों का पडाव था) और रिक्शा चालक के भेष में प्रिया सिनेमा जाता था और सिर्फ लड़कियों या कमउम्र महिलाओं को उनके घर छोड़ता था. सवारी करते करते वह शुद्ध हिंदी या अंग्रेजी में बातें करता. आश्चर्यचकित सवार हुई महिलाओं या लड़कियों से पूछे
जाने पर बताता की वह एक गरीब विद्यार्थी है जो दिन में पदाई करता है और रात को रिक्सा चलाता है. यह दिल जीतने और दिलफरेबी का नायाब नमूना था. मैंने यह भी सुना था की वह बुरका पहन सब्जी बाग के उस हिस्से में घूमता था जहाँ चूड़ी-बिंदी बिकती थी ओर खरीददारों में महिलाएं ही होती थीं.
हमारा कॉलेज co-ed नहीं होने के कारन एक 'हीन भावना' से ग्रस्त था जो विभिन्न रूपों में परिलक्षित होता था. कुछ विद्यार्थी स्टुडेंट स्पेशल बसों में छेड़खानी करते या सड़क के पास खड़े होकर आती-जाती लड़कियों पर फब्तियां कसते. होली जब करीब आती तो रिक्सा =बसों से सफ़र करती लड़कियों पर गुलाला भी फेंका जाता.
झुंड-मानशिकता से अलग एक और घटना याद आती है. मेरा एक दोस्त जो अंग्रेजी साहित्य का विद्यार्थी था , सेक्स से काफी obsessed था . वह गोविन्द मित्र रोड के पास एक lodge में रहता था जहाँ ज्यादातर medial स्टूडेंट्स रहते थे. एकदिन सबेरे-सबेरे उसने मेरा दरवाज़ा खटखटाया , चेहरा फुला और खूनी खरोंचों से भरा. पता चला कि हमारे मित्र के कमरे के बगल में एक मेडिकल विद्यार्थी थे जिनकी नयी नयी शादी हुई थी और उन्होंने अपनी नयी नवेली पत्नी को lodge में कुछ दिनों के लिए ले आये थे . मेरे मित्र सारी रात प्रेम और काम क्रीडा की कल्पना करते रहे और जब उसे और सब्र नहीं रहा तो उसने गर्मियों के मौसम के उस रात में अधखुली
खिड़की से अन्दर झाँकने की कोशिश की . उस विद्यार्थी ने उसे देख लिया और उसकी जम कर पिटाई की. मुझे अपने मित्र पर दया आयी मगर मैं यह नहीं समझ नहीं पाया की जो लड़का एक ओर नुक्कड़ नाटक करता है और मुझसे wordsworth और milton की बातें करता है वह ऐसी हरकत भी कर सकता है. शायद दोष उसका नहीं उस सामाजिक वातावरण का था.
हमारे कॉलेज के पास गंगा घाट भी था. छठ पर्व के दिन हम रास्ते पर बाकायदा चादर बिछा देते और ठेन्कुँआँ मांगते. यह तकरीबन एक सप्ताह तक हमारे नाश्ते में काम आता.
उसी दौरान क्रिकेट और टीवी का प्रवेश हुआ . भारत ने कपिलदेव के नेतृत्व में विश्व कप जीता और आधी रात को मेरे एक मित्र ने (जो अब railways में उच्चाधिकारी हैं ) भारत के गर्व से गौरवान्वित होकर अपना वस्त्र उतार , बिलकुल नग्न होकर हॉस्टल की चौहद्दी की परिक्रमा की ओर हॉस्टल से पान दूकान तक दौड़ लगाकर एक नयी मिसाल कायम की.
कुछ विद्यार्थी प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित होकर नुक्कड़ नाटक करते थे. मैंने भी एक लघु पत्रिका में प्रकाश झा की फिल्म "दामुल" पर एक लेख लिखी थी.
इन सब नवयुवक सुलभ बातों-व्यवहारों के बीच हिंसा की पौध भी tejee से पनप रही थी. रंगदार विद्यार्थियों का एक झुंड अशोक राजपथ के दूकानों से बिना पैसा दिए सामान ले लेता था. उसी दौरान हमारे हॉस्टल में राजपूत और भूमिहार गुटों के बीच घमासान संघर्ष शुरू हुआ. यह एक लम्बा सिलसिला था. शाम को जब वापस हॉस्टल आता तो पता चलता की बमबारी हुई है और विद्यार्थीयों की जगह पुलिस दिखाई देते. हॉस्टल खाली करा दिया जाता और पहली बार एक नया शब्द सुना: sine die . हॉस्टल में पुलिस की बंदोबस्त होने लगी. ऐसा कई बार या यो kahen बार-बार होने लगा. फिर मैंने सुना की बैकॅवाङ - फॉरवर्ड के संघर्ष में वीर सिंह बुरी तरह जख्मी हो गया . मुश्किल से जान बची. मैं उससे मिलने PMCH भी गया.
इन्ही परिस्थितियों के बीच हमारी पढाई हो रही थी. हमारी B. A. (Hons) की परीक्षा करीब आ गयी . असली प्रतियोगिता हमारे और पटना कॉलेज के बीच थी. हमलोग अपने सूत्रों से यह पता लगाने की कोशिश करते की पटना कॉलेज में topper होने का कौन दावेदार है. सच कहूं तो मित्र बीरू का नाम सामने आया . उनसे मेरे कभी मुलाकात नहीं हुई हाँ वर्षों बाद वे जेएनयू में मेरे मित्र बने और अभी भी मित्र हैं.
पुलिस बंदोबस्त के बीच व्हीलर सीनेट हॉल में परीक्षा हुई और नतीजा भी आया . मैं प्रथम श्रेणी में द्वितीय स्थान पर था और प्रथम स्थान पर एक ऐसा विद्यार्थी था जिसे कोइ जानता भी नहीं था. सुना की वह कुलपति या उपकुलपति का दामाद था . उसकी बहुत ऊँची पहुँच थी और इसीलिये वह बना topper!
आज इतने वर्षों के बाद उन बातों को याद कर एक मिश्रित , कुछ आसक्त कुछ निरासक्त भावना उमगती है . अगर मैं राजपूत, भूमिहार या अन्य जातीय गुट में शामिल होने को मजबूर होता तो क्या होता ? कितना संकीर्ण फासला था सही या गलत रास्तों में ? उस उम्र में भला कितनी वैचारिक परिपक्वता थी , सही और गलत के फर्क को समझने में ? सचमुच " बहुत कठिन थी डगर पनघट की."
मैंने १९८१ में रांची से intermediate (विज्ञान) किया . उसी दौरान मेरी रूचि सामाजिक विज्ञान की ओर बढ़ी और समाजशास्त्र (sociology) पदने के लिए पटना गया. सच कहूं तो मुझे रांची छोड़ना था और मैंने ऐसा विषय चुना जिसकी पढाई रांची विश्वविद्यालय में नहीं थी. पटना में सिर्फ एक ही करीबी दोस्त था जो बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में mechanical इंजीनियरिंग पढ़ रहा था. उसने उसी समय admission लिया था और मुस्सलह पुर हाट के एक लौज में रहता था. मेरा दोस्त पटना में दो साल गुजार चुका था क्योंकि वह मुझसे सीनियर था और I.Sc. की पढ़ाई उसने साइंस कॉलेज से की थी हालाँकि वह लौज में ही रहता था. उसने मुझे पटना दिखाया -घुमाया. अशोक राजपथ, बोरिंग केनाल रोड, कदम कुआँ , गाँधी मैदान, गोल घर, गंगा घाट, सिनेमा घर, आदि आदि.
गाँधी मैदान का एक खास आकर्षण था : रोज़ शाम को एक आदमी अपना मजमा लगता था जैसे कोई मदारी. उसके चारो तरफ हरेक उम्र के लोग कौतुहल और विमुग्ध होकर उसकी बातें सुनते थे. बहुतों के लिए यह शाम गुजारने का मुफ्त मनोरंजन था. वह काफी हँसता -हँसाता था . वह एक खास नुस्खे की दवा बेचता था : यौन शक्ति बढ़ाने की दवा. उसका दावा था की उस दवा के ताकत से बूढा अधमरा व्यक्ति भी खटिया तोड़ सकता है. हमें तो उस दवा की जरूरत तो थी नहीं, जरूरत थी उस यौन मायालोक के तिलस्मी मनोरंजन की .
कभी-कभी हम नाश्ते के लिए अशोक राजपथ जाते थे. हम collegiate वाली गली के समोसे और जलेबा (जलेबी स्त्रीलिंग तो जलेबा अपनी विराटता के लिए जलेबा) के मुरीद थे. मेरे एक मित्र ने हाल में बताया की श्री लल्लू प्रसाद यादव ने एक बार "रैली' नहीं " रैला" निकाला. पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने बताया की " रैला" रैली का husband है. खैर, वहां विद्यार्थियों का हुजूम लगा रहता था खासकर पटना में कोचिंग लेने वाले विद्यार्थ्यीयों से. उस वक्त के कोचिंग स्कूल्स का व्यवसाय जोरों से शुरू हुआ था क्योंकि हमारे हमउम्र के विद्यार्थियों का और खासकर उनके अभिभावकों का सपना होता था : मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला. यह शिक्षा के व्यापक व्यवसायीकरण का शुरुआती दौर था.
पटना विश्वविद्यालय में उस समय B. A. का admission शुरू नहीं हुआ था. खैर एक दो महीने के बाद मेरे दोस्त को हॉस्टल मिल गया जो law college के पास था और मजबूरन मुझे भी उसके साथ वहां रहना पड़ा. हॉस्टल में आकर पता चला की वह हॉस्टल तथाकतित scheduled castes और Backward castes के लिए अनौपचारिक रूप से आरक्षित था. law college पर उसी तरह ऊँचे वर्णों का वर्चस्व था. धीरे धीरे मुझे थोड़ी -थोड़ी जातिय समीकरण और छात्रालयों में उनकी प्रभुता या प्रभुत्व जमाने की होड़ समझ में आने lagee . मुझे पता चला कि फॉरवर्ड जाति-वर्ग में राजपूत और भूमिहार के बीच नहीं पटती. संक्षिप्त में कहा जाये तो एक और राजपूत-भूमिहार के बीच का दरार और उससे उपजी हिंसा तो दूसरी तरफ फोर्वार्ड और बैक्वार्ड जातियों का उभरता हुआ ध्रुवीकरण ओर इस प्रक्रिया के पीछे प्रशासनिक, शासकीय ओर पार्टीगत राजनीति का परिदृश्य !
मजे की बात यह की मेरा दोस्त Backward जाति का था और हम दोनों में जातिगत कोई भावना ही नहीं थी क्योंकि हम बचपन के दोस्त थे. लेकिन उसने मुझे अपने हॉस्टल में 'Backward' घोषित कर दिया. मेरे survival के लिए यह एक मामूली सा समझौता था जो मुझे कभी अखरा भी नहीं और मेरा surname भी इतना सर्वव्यापी था की किसीको कोई शक नहीं हुआ. उस हॉस्टल के मुखिया थे वीर सिंह (नाम बदला है ) उसे मेरी ग़ज़लें पसंद थी . वह एक बुद्धिमान और प्रतिभाशाली विद्यार्थी था जो धीरे-धीरे जातिगत हिंसा के दलदल में फंसता जा रहा था. वर्तमान में मिलने वाला दबदबा उसकी हौसला-आफज़ाई कर रहा था. उसने एक दिन मुझे देसी तमंचा दिखाया और एक दिन जब सिर्फ हम दोनों अकेले थे तो उसने कहा मैं जानता हूँ तुम Backward नहीं हो लेकिन यह राज राज ही रहे. उसदिन के बाद मैं और मेरा दोस्त काफी सहमे रहते थे की किसी तरह मेरा राज न खुल जाए .
खैर थोड़े दिनों में मुझे B. N. college के हॉस्टल में दाखिला मिल गया. मैंने B. N. college में इस लिए दाखिला लिया था क्योंकि कुछ सीनियर विद्यार्थिओं के सुझाव के मुताबिक, वहां का sociology विभाग पटना college से बेहतर था. हॉस्टल काफी भब्य था बिलकुल college के पास. हॉस्टल के वार्डेन जो मेरे विभागाद्ययक्ष भी थे मेरे पिताजी को जानते थे और उन्होंने एक अच्छा (?) सा कमरा allot कर दिया. पहले ही दिन जब मैंने अपना सामान रखकर बड़े से गोदरेज ताले से कमरा बंद कर गाँधी मैदान जाकर और वहां की घास पर लेटकर वापस लौटा तो पाया की कमरे की चाभी गाँधी मैदान में खो गयी है. वापस मैदान में ढूँढने की कोशिश नाकाम रही. लाचार होकर सब्जी बाग़ गया और लोहा काटने का ब्लेड खरीदा और दो घंटे लगे , गोदरेज का ताला काटने में. हॉस्टल में मैं किसीको नहीं जानता था. दो-तीन बाद एक नया रूममेट आया , जाति का राजपूत, उद्दंड स्वाभाव और राजधानी के मौजूदा फैशन से कदम से कदम मिलाने वाला. हालाँकि, अपने क्लास में कुछ day scholars से मित्रता बढ़ी और अकेलापन कम होने लगा. मेस में कुछ और मित्र बने.
मेस में मैथिल बावर्ची और कर्मचारी थे. मेरे कमरे की खिड़की मेस की ओर खुलता था. अपना कम खतम कर वे गांजा -बीडी पीते और जोर जोर से बतियाते थे जो मेरे पोस्ट-लंच siesta में खलल डालता था. मेरी काफी झड़पे होती थीं. मेस का एक आकर्षण था : आलू का कुरकुरा ( छना हुआ ) भुंजिया , जो सभी काफी चटक से खाते थे. कुछ मित्र अपने साथ अचार और घी लाते थे . हाँ, एक चीज़ मेरी नज़र में पड़ी की कुछ खास लोगों के लिए खास खाना banta था और उन्हें रूम-सर्विस की सुविधा थी. कौन थे वे लोग ?
थोड़े दिनों में पता चला की हॉस्टल के तीन blocks तीन जाति वर्गों पर आधारित थे. एक ब्लाक पर राजपूतों का वर्चस्व था तो दुसरे पर भूमिहारों का कब्ज़ा. मेरा ब्लाक थोडा मिश्रित था तब पता चला वार्डेन ने मुझे उस ब्लाक में क्यों कमरा क्यों दिया. हॉस्टल के पास अशोक राजपथ के कोने पर एक पान की दूकान थी जहाँ राजपूतों का नेता खादी का कुरता पजामा पहन अपना अड्डा लगाता था. देखने में वह शालीन था और दाढी के कारण उसमे एक गाम्भीर्य था. मैंने सुना था कि वह रात में रिक्शा लेकर (बगल में ही रिक्शे वालों का पडाव था) और रिक्शा चालक के भेष में प्रिया सिनेमा जाता था और सिर्फ लड़कियों या कमउम्र महिलाओं को उनके घर छोड़ता था. सवारी करते करते वह शुद्ध हिंदी या अंग्रेजी में बातें करता. आश्चर्यचकित सवार हुई महिलाओं या लड़कियों से पूछे
जाने पर बताता की वह एक गरीब विद्यार्थी है जो दिन में पदाई करता है और रात को रिक्सा चलाता है. यह दिल जीतने और दिलफरेबी का नायाब नमूना था. मैंने यह भी सुना था की वह बुरका पहन सब्जी बाग के उस हिस्से में घूमता था जहाँ चूड़ी-बिंदी बिकती थी ओर खरीददारों में महिलाएं ही होती थीं.
हमारा कॉलेज co-ed नहीं होने के कारन एक 'हीन भावना' से ग्रस्त था जो विभिन्न रूपों में परिलक्षित होता था. कुछ विद्यार्थी स्टुडेंट स्पेशल बसों में छेड़खानी करते या सड़क के पास खड़े होकर आती-जाती लड़कियों पर फब्तियां कसते. होली जब करीब आती तो रिक्सा =बसों से सफ़र करती लड़कियों पर गुलाला भी फेंका जाता.
झुंड-मानशिकता से अलग एक और घटना याद आती है. मेरा एक दोस्त जो अंग्रेजी साहित्य का विद्यार्थी था , सेक्स से काफी obsessed था . वह गोविन्द मित्र रोड के पास एक lodge में रहता था जहाँ ज्यादातर medial स्टूडेंट्स रहते थे. एकदिन सबेरे-सबेरे उसने मेरा दरवाज़ा खटखटाया , चेहरा फुला और खूनी खरोंचों से भरा. पता चला कि हमारे मित्र के कमरे के बगल में एक मेडिकल विद्यार्थी थे जिनकी नयी नयी शादी हुई थी और उन्होंने अपनी नयी नवेली पत्नी को lodge में कुछ दिनों के लिए ले आये थे . मेरे मित्र सारी रात प्रेम और काम क्रीडा की कल्पना करते रहे और जब उसे और सब्र नहीं रहा तो उसने गर्मियों के मौसम के उस रात में अधखुली
खिड़की से अन्दर झाँकने की कोशिश की . उस विद्यार्थी ने उसे देख लिया और उसकी जम कर पिटाई की. मुझे अपने मित्र पर दया आयी मगर मैं यह नहीं समझ नहीं पाया की जो लड़का एक ओर नुक्कड़ नाटक करता है और मुझसे wordsworth और milton की बातें करता है वह ऐसी हरकत भी कर सकता है. शायद दोष उसका नहीं उस सामाजिक वातावरण का था.
हमारे कॉलेज के पास गंगा घाट भी था. छठ पर्व के दिन हम रास्ते पर बाकायदा चादर बिछा देते और ठेन्कुँआँ मांगते. यह तकरीबन एक सप्ताह तक हमारे नाश्ते में काम आता.
उसी दौरान क्रिकेट और टीवी का प्रवेश हुआ . भारत ने कपिलदेव के नेतृत्व में विश्व कप जीता और आधी रात को मेरे एक मित्र ने (जो अब railways में उच्चाधिकारी हैं ) भारत के गर्व से गौरवान्वित होकर अपना वस्त्र उतार , बिलकुल नग्न होकर हॉस्टल की चौहद्दी की परिक्रमा की ओर हॉस्टल से पान दूकान तक दौड़ लगाकर एक नयी मिसाल कायम की.
कुछ विद्यार्थी प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित होकर नुक्कड़ नाटक करते थे. मैंने भी एक लघु पत्रिका में प्रकाश झा की फिल्म "दामुल" पर एक लेख लिखी थी.
इन सब नवयुवक सुलभ बातों-व्यवहारों के बीच हिंसा की पौध भी tejee से पनप रही थी. रंगदार विद्यार्थियों का एक झुंड अशोक राजपथ के दूकानों से बिना पैसा दिए सामान ले लेता था. उसी दौरान हमारे हॉस्टल में राजपूत और भूमिहार गुटों के बीच घमासान संघर्ष शुरू हुआ. यह एक लम्बा सिलसिला था. शाम को जब वापस हॉस्टल आता तो पता चलता की बमबारी हुई है और विद्यार्थीयों की जगह पुलिस दिखाई देते. हॉस्टल खाली करा दिया जाता और पहली बार एक नया शब्द सुना: sine die . हॉस्टल में पुलिस की बंदोबस्त होने लगी. ऐसा कई बार या यो kahen बार-बार होने लगा. फिर मैंने सुना की बैकॅवाङ - फॉरवर्ड के संघर्ष में वीर सिंह बुरी तरह जख्मी हो गया . मुश्किल से जान बची. मैं उससे मिलने PMCH भी गया.
इन्ही परिस्थितियों के बीच हमारी पढाई हो रही थी. हमारी B. A. (Hons) की परीक्षा करीब आ गयी . असली प्रतियोगिता हमारे और पटना कॉलेज के बीच थी. हमलोग अपने सूत्रों से यह पता लगाने की कोशिश करते की पटना कॉलेज में topper होने का कौन दावेदार है. सच कहूं तो मित्र बीरू का नाम सामने आया . उनसे मेरे कभी मुलाकात नहीं हुई हाँ वर्षों बाद वे जेएनयू में मेरे मित्र बने और अभी भी मित्र हैं.
पुलिस बंदोबस्त के बीच व्हीलर सीनेट हॉल में परीक्षा हुई और नतीजा भी आया . मैं प्रथम श्रेणी में द्वितीय स्थान पर था और प्रथम स्थान पर एक ऐसा विद्यार्थी था जिसे कोइ जानता भी नहीं था. सुना की वह कुलपति या उपकुलपति का दामाद था . उसकी बहुत ऊँची पहुँच थी और इसीलिये वह बना topper!
आज इतने वर्षों के बाद उन बातों को याद कर एक मिश्रित , कुछ आसक्त कुछ निरासक्त भावना उमगती है . अगर मैं राजपूत, भूमिहार या अन्य जातीय गुट में शामिल होने को मजबूर होता तो क्या होता ? कितना संकीर्ण फासला था सही या गलत रास्तों में ? उस उम्र में भला कितनी वैचारिक परिपक्वता थी , सही और गलत के फर्क को समझने में ? सचमुच " बहुत कठिन थी डगर पनघट की."
मित्र , इसके बाद के पोस्ट का इंतज़ार लंबा होता जा रहा है .कुछ लोग इसे इमोशनल अत्याचार की संज्ञा से भी विभूषित कर सकते हैं. तो अगली कड़ी तुरत लिख भेजें
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